Sunday, January 10, 2021

तीन दानों का उपहार (यूक्रेन की लोक कथा)

लोककथाओं से मेरा प्रेम आप सब से छिपा नहीं है, और उन्हें हमेशा मैं इस ब्लॉग पर शेयर करना चाहता रहा हूँ. दुर्भाग्यवश मेरे पास लगभग सभी लोककथाओं की पुस्तकें अंग्रेजी में ही हैं. आज मैंने काफी मन बना कर एक लोककथा को हिंदी में अनुवादित की है - ताकि आप भी इसका आनंद ले सकें. 

तो प्रस्तुत है - यूक्रेन के लोक कथा का हिंदी रूपांतरण  - 
तीन दानों का उपहार (यूक्रेन की लोक कथा)  

यूक्रेन के किसी राज्य में एक अमीर जमींदार रहता था. वह बेहिसाब पशुओं,खेतों और जंगलों का स्वामी था. वह इतना दौलतमंद था कि उस राज्य का राजा भी उसकी सम्पन्नता से जलता था. उस जमींदार के पास मैक्सिम नाम का एक गरीब मजदूर कार्य करता था जो एक छोटी सी एक खिड़की वाली झोपड़ी में रहता था. वह घर इतनी बुरी स्थिति में था कि हवा चलने पर उसके छप्पर उड़ जाते और बारिश के मौसम में दीवारों से पानी रिसता रहता था. इस टूटी-फूटी झोपड़ी में वह अपने बड़े से परिवार के साथ रहता था. इस बड़े परिवार के लिए खाना की व्यवस्था बहुत ही दुष्कर कार्य था.

 

वसंत का मौसम था और उन्हें खेतों में बीज बोने थे परन्तु उनके पास अन्न का एक दाना भी नहीं था. मैक्सिम की पत्नी जोर-जोर से रोते हुये बोली.

“हमारे पड़ोसियों ने पहले से ही बुआई कर ली है और हमनें अभी तक जुताई तक नहीं की है. तुम्हें कुछ करना होगा तभी हम अगला साल गुजार पायेंगे.”

 “चिंता न करो. मैं जमींदार से कुछ दाने मांग कर लाता हूँ. उन्हें हम बो लेंगे और अगले साल हमारी अपनी फसल होगी.” – मैक्सिम ने कहा और जमींदार के घर की ओर चल पड़ा.

“मालिक, मेरे पास खेत में बोने के लिए अनाज नहीं है. कृपया करके मुझे बोने के  कुछ मक्के के दाने दे दीजिये. नहीं तो मेरा परिवार भूख से मर जाएगा.”

परन्तु जमींदार दुष्ट था और उसने खेतों में बोने के लिए अनाज के दाने देने से साफ़ इनकार कर दिया. मैक्सिम उदास होकर घर लौट गया.

बसंत का सुहावना मौसम था, पक्षी दक्षिण से वापस लौट रहे थे. हर तरह प्रसन्नता थी परन्तु मैक्सिम और उसकी पत्नी उदास बैठे थे. उनके बच्चे भोजन न मिलने से कमजोर हो गए थे.

अचानक से दो गौरैया उड़कर आयीं और मैक्सिम के झोपड़ी के छप्पर पर घोंसला बनाने लगीं. मैक्सिम ने उनसे कहा, “ प्यारी चिड़ियाओं, इस जर्जर छप्पर पर घोंसला क्यों बना रही हो? पहली बारिश में ही ये गिर जाएगा.”

परन्तु गौरैयाओं ने उसकी नहीं सुनी. कुछ दिनों बाद उस घोंसले में उनके बच्चों का जन्म भी हो गया. अब मैक्सिम की झोपड़ी में दिन भर उछल-कूद मची रहती.

दुर्भाग्यवश एक दिन एक दुष्ट सांप आ गया और घोंसले की ओर बढ़ने लगा. मैक्सिम के बच्चों ने उसे देखकर शोर मचाया और मैक्सिम ने उसे मार भगाया. परन्तु दुष्ट साँप ने गौरैया के तीन बच्चों को निगल लिया था. चौथा बच तो गया परन्तु उसके पैर बुरी तरह से जख्मी था.

मैक्सिम और उसके बच्चे उसे घर ले आये और उसकी देखभाल की. जब वह स्वस्थ हो गया तो उसे आजाद छोड़ दिया.

ग्रीष्म बीत चूका था और पतझड़ का मौसम आ गया था. परिंदे ठन्डे इलाकों की ओर उड़ चले थे. बर्फीली ठण्ड के बाद परिंदे वापस लौट आये.

मौसम तो बदल गए परन्तु मैक्सिम के परिवार की बदकिस्मती ने  उनका साथ न छोड़ा. परन्तु एक दिन एक गौरैया आई और उसने खिड़की पोअर दस्तक दी.

“तुम्हें क्या चाहिए प्यारी चिड़िया?” – मैक्सिम ने पूछा.

गौरैया ने अपनी चोंच में दबा एक दाना नीचे गिराया और मैक्सिम से उसे घर के दरवाजे ने सामने बोने को कहा. चिड़िया उड़ गयी और फिर से एक दाना लेकर आई. इस बार उसने मैक्सिम से उसे खिड़की के पास बोने को कहा. तीसरा दाना लाकर उसने उसे कुएँ के पास बोने के लिए कहा.

 

मैक्सिम ने गौरैया का धन्यवाद अदा करते हुये बीजों को कहे अनुसार बो दिया. अगली सुबह उसके बच्चों की नींद जल्दी खुल गयी और वे घर के बाहर खेलने निकल गए परन्तु अगले ही क्षण वे सरपट दौड़ते वापस लौटे और डरी हुयी आवाज में बोले – “पिताजी, बाहर कुछ अजीब से चीज उगी हुयी है. वो इतनी बड़ी है, इतनी बड़ी है कि ..........................”

 

आश्चर्य से भरा मैक्सिम बाहर आया और दरवाजे, खिड़की और कुएँ के पास विशालकाय कद्दू उगे हुये थे. वे पहले से ही पके हुये थे और सूर्य की किरणों के साथ चमक रहे थे. मैक्सिम ने उन्हें उठाने का प्रयास किया पर उनका आकार ऐसा था कि कोई दैत्य ही उन्हें उठा सकता था.

 

मैक्सिम उसे लुढ़काटा हुआ घर के पास लाया और उसे बीच से काटा. उसे अपनी आखों पर विश्वास न हुआ. अन्दर सफ़ेद ब्रेड, मक्खन, पनीर, मक्के, भुने हुये खाने, मिठाईयाँ, आचार और मसाले भरे हुये थे. मैक्सिम ने खाने के सामान को उठा-उठाकर टेबल पर रख दिया पर कद्दू अभी भी भरा हुआ था. सबने वर्षों बाद जी भरकर खाना खाया और फिर कटे हुये कद्दू को साफ़ कपड़े से ढँक दिया.

 

जिज्ञासा से भरे मैक्सिम ने अब दूसरा कद्दू भी काट डाला. उसके अन्दर पहनने के खूबसूरत कपड़े थे. कपड़े इतने सुन्दर थे कि अमीर से अमीर आदमी भी उसका केवल सपना देख सकता था. खुद मैक्सिम ने अपने मालिक को इतने सुन्दर कपड़े पहने नहीं देखा था. कद्दू के अन्दर केवल कपड़े ही नहीं बल्कि जूते, चप्पल, कोट, मोतियाँ, हार और भी ढेर सारे आभूषण थे.

मैक्सिम का पूरा परिवार ख़ुशी के कारण रो पड़ा. उन्होंने अपने सपनों में भी ऐसी चीजें नहीं देखी थी. अब उनसे रहा नहीं गया और तीसरा कद्दू भी काल डाला गया. उसके अन्दर से सोने का भंडार निकला.

“अब हमें कभी भी भूखा नहीं रहना होगा और उस निर्दयी जमींदार के सामने भी नहीं झुकना पड़ेगा.” – मैक्सिम ने प्रसन्नता पूर्वक कहा.

अब वे अमीरों की तरह कपड़े पहनते और लज़ीज भोजन करते. जल्द ही उन्होंने एक नया घर बनाना भी शुरू कर दिया. गाँव में जल्द ही गरीब मैक्सिम के भाग्य बदलने की कहानी मशहूर हो गयी और जमींदार के कानों तक भी पहुँच गयी.

गुस्से में भरा हुआ जमींदार मैक्सिम के पास पहुँचा और उससे कठोर शब्दों में सच पूछा. मैक्सिम ने उसे पूरी कहानी सूना दी कि कैसे गौरैया ने उसके छप्पर पर घोंसला बनाया और कैसे एक गौरैया ने उसे अमीर बनाया. जमींदार महल लौट आया और अपने लालच को पूरा करने के लिए उसने एक बड़ा सा घोंसला बनवाया. काफी दिनों तक कुछ नहीं हुआ.

 

लेकिन एक दिन दो गौरैया वह आये और उन्होनें वह अंडे दिए. अब दुष्ट जमींदार मैक्सिम की सुनाई कहानी के अनुसार सांप का इन्तेजार करने लगा परानु कोई सांप नहीं आया. कई दिन बीत गये और जमींदार बेसब्र हो उठा. उसने अपने हाथों में सांप की खाल डाली और सीढ़ी चढ़कर चिड़िया के सभी बच्चों को बेरहमी से मार दिया और एक बच्चे के पैर को घायल कर दिया. फिर उस घायल पक्षी को लेकर उसकी देखभाल की और ठीक होने पर उसे आज़ाद कर दिया. सबकुछ मैक्सिम की बताई कहानी के अनुसार उसने किया.

 

इस बार भी एक गौरैया अपने प्रवास से वापस आकर महल पहुंची और तीन दाने जमींदार को दिए. उसने उन्हें दरवाजे, खिड़की और कुएँ के पास बोने के लिए कहा – ठीक वैसे ही जैसे उसने मैक्सिम को कहा था.

जल्द ही जमींदार द्वारा बोये बीजों से बड़े-बड़े लौकी निकल आये. जैसे ही दुष्ट और लालची जमींदार ने पहली लौकी काटी, उसमें से खाने की चीजों के बदले टिड्डियो का बड़ा सा दल निकला और उसने जमींदार के खेतों और बगीचों को तबाह कर दिया.

 

जमींदार ने सबक न लेते हुये दूसरा लौकी भी काट डाला. कटे हुये लौकी से आग की तेज लपटें निकली और जमींदार के महल और संपत्तियों को राख कर गयी.

तीसरी लौकी कभी नहीं कटी क्योंकि जमींदार बदहवास होकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ. लोगों का  कहना है कि उस तीसरी लौकी में जहरीला सांप है. अगर कभी जमींदार वापस आया तो यह खुद ही निकलकर उसे मार डालेगा.

उधर मैक्सिम और उसका परिवार हमेशा सुख से रहने लगा.

 

सीख – हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए. गौरैया के बच्चे की मदद करके मैक्सिम और उसका पूरा परिवार संपन्न हो गया. वहीँ अपने स्वार्थ के लिए गौरैया के छोटे-छोटे बच्चों को मारने वाला जमींदार बर्बाद हो गया. इसलिए हमें कभी भी गलत कार्य नहीं करना चाहिए.  

 

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