Tuesday, October 25, 2022

बचपन में पढ़ी कहानी 13 - बालक चंद्रगुप्त

पाटलिपुत्र के पिपली कानन के मौर्य सेनापति का एक टूटा-फूटा घर था। महापद्मनंद के अत्याचार से मगध काँप रहा था। मौर्य सेनापति के बंदी हो जाने के कारण उनके कुटुंब का जीवन किसी प्रकार कष्ट में बीत रहा था।
एक बालक उसी घर के सामने खेल रहा था। कई लड़के उसकी प्रजा बने थे और वह था राजा। उन्हीं लड़कों में से वह किसी को घोड़ा किसी को हाथी बनाकर चढ़ता और दंड तथा पुरस्कार आदि देने का राजा के समान अभिनय कर रहा था।



उसी ओर से एक ब्राह्मण जा रहे थे। उनका नाम था 'चाणक्य'। वे बड़े बुद्धिमान थे। उन्होंने उस बालक की राजक्रीड़ा बड़े ध्यान से देखी। उनके मन में कौतुहल भी हुआ और कुछ विनोद भी सूझा। उन्होंने ठीक-ठीक ब्राह्मण की तरह उस बालक के पास जाकर याचना की, "राजन, मुझे दूध पीने के लिए गऊ चाहिए।"

बालक ने राजा के समान उदारता का अभिनय करते हुए, सामने चरती हुई गायों को दिखाकर कहा - "इनमें से जितनी इच्छा हो, तुम ले लो। "
ब्राहमण ने हँसकर कहा, “राजन्, ये गायें जिसकी हैं, वह मारने लगे तो ?”
बालक ने गर्व के साथ छाती फुलाकर कहा - " किसका साहस है, जो मेरे शासन को न माने? जब मैं राजा हूँ, तब मेरी आज्ञा अवश्य मानी जाएगी।"
ब्राह्मण ने आश्चर्य से पूछा, "राजन्, आपका शुभ नाम क्या है ?"
तब तक उसकी माँ वहाँ आ गई और ब्राह्मण से हाथ जोड़कर बोली, "महाराज, यह बड़ा ढीठ लड़का है। इसके किसी अपराध पर ध्यान न दीजिएगा। "
चाणक्य ने कहा- "कोई चिन्ता नहीं, यह बड़ा होनहार बालक है। उन्नति के लिए तुम इसे किसी प्रकार राजकुल में भेजा करो। "
उसकी माँ रोने लगी और बोली- “हम लोगों पर राजकोष है और हमारे पति राजा की आज्ञा से बंदी किए गए है। "
ब्राह्मण ने कहा, “बालक का कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम इसे अवश्य राजकुल में ले जाओ। ”
इतना कहकर बालक को आर्शीवाद देकर वह चला गया। उसकी माँ बहुत डरते-डरते एक दिन अपने चंचल और साहसी लड़के को लेकर राज- सभा में पहुँची।
नंद एक निष्ठुर, मूर्ख और निर्दयी राजा था । उसकी राजसभा बड़े-बड़े चापलूस मूर्खो से भरी रहती थी।
पहले राजा लोग एक-दूसरे के बल, बुद्धि और वैभव की परीक्षा लिया करते थे और इसके लिए वे तरह-तरह उपाय रचते थे ।
उसी समय, जव बालक माँ के साथ राज सभा में पहुँचा, किसी राजा के यहाँ से नंद की राज-सभा की बुद्धि का अनुमान करने के लिए, लोहे के पिजड़े में मोम का सिंह बनाकर भेजा गया था और उसके साथ यह कहलाया गया था कि पिंजड़े को खोले बिना सिंह को निकाल लीजिए ।
सारी राज सभा इस पर विचार करने लगी। पर उन चापलूस, मूर्खो को कोई उपाय नहीं सूझा |
अपनी माता के साथ बालक वह लीला देख रहा था। वह भला कब मानने वाला था ? उसने कहा, “मैं निकाल दूँगा।" सब लोग हँस पड़े। बालक की ढिठाई भी कम न थी। राजा नंद को भी आश्चर्य हुआ। नंद ने कहा, "यह कौन है ?"
मालूम हुआ कि राजबंदी मौर्य सेनापति का यह लड़का है। फिर क्या था । नंद की मूर्खता की अग्नि में एक और आहुति पड़ी । क्रुद्ध होकर बोला, “यदि तू इसे न निकाल सकेगा, तो तू भी इस पिंजड़े में बंद कर दिया जाएगा।"
उसकी माता ने देखा कि यह कहाँ से विपत्ति आई । परंतु बालक बिना डरे आगे बढ़ा और पिंजड़े के पास जाकर उसने उसको भली-भाँति देखा। फिर लोहे की छड़ों को गर्म करके उस सिंह को गलाकर पिंजड़े को खाली कर दिया।
सब लोग चकित रह गए। राजा ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है ?" उसने कहा, "चंद्रगुप्त ।”

राजा ने प्रसन्न होकर उसे तक्षशिला के विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा। आगे चलकर यही बालक, ब्राहमण 'चाणक्य' की सहायता से, चक्रवर्ती सम्राट "चंद्रगुप्त मौर्य" हुआ।