Wednesday, March 9, 2011

इब्ने सफी और जासूसी दुनिया

पिछले कुछ दिनों से मैं चित्रकथाओं के इस ब्लॉग को एक नया रूप देने के बारे में गंभीरता पूर्वक विचार कर रहा था,  मीना की कहानियाँ और प्राचीन मिस्र पर किताब इसी विचार की शुरुआत का नतीजा है. पूर्व में भी मैंने इस ब्लॉग पर कुछ प्रसिद्ध उपन्यास संजोये थे और अन्य विषयों पर चर्चा भी की थी परन्तु फिर भी इसका स्वरुप मुख्यतः कॉमिक्स ब्लॉग का ही रहा था, खैर अब मेरा विचार इस ब्लॉग को पूर्णतः नया रूप देखर इसे एक विस्तृत ब्लॉग के रूप में परिवर्तित करने का है, देखें आप और मैं कहा तक जा पाते हैं!

उपन्यासों से मेरा रिश्ता कम ही है परन्तु कुछ ऐसे उपन्यासकार हुए हैं जिन्हें मैं पसंद करता रहा हूँ - इन्ही में से एक हैं - संपूर्ण एशिया महादीप में सर्वाधिक जाने जाने वाले जासूसी उपन्यासकार इब्ने सफी. जो जासूसी उपन्यासों में रूचि रखते हैं उन्होंने इब्ने सफी की कृतियाँ अवश्य पढ़ी होंगी. उर्दू की इस महान शख्सियत की महानता को इन पन्नों में समेटना उतना ही अर्थहीन है जितना ताजमहल को केवल एक ईमारत कहना. 

इब्ने सफी (एक संक्षिप्त परिचय) -
इब्ने सफी (मूल नाम असरार अहमद) का जन्म का जन्म 26 जुलाई 1928 को उत्तर प्रदेश के  इलाहाबाद जिले के नारा नामक स्थान में हुआ था.  कला में स्नातक की उपाधि लेने के पश्चात् वे 1948 में नकहत  प्रकाशन में कविता विभाग में एडिटर के रूप में अपने प्रथम कार्य में जुड़ गए.  नकहत प्रकाशन की स्थापना 1948 में ही उनके घनिष्ठ मित्र और प्रेरणा स्त्रोत अब्बास हुसैनी जी ने की थी. इसी समय इब्ने सफी ने विविध विधाओं में अपने हुनर के साथ प्रयोग किया और प्रथम कहानी 'फरार' का प्रकाशन इसी वर्ष हुआ, परन्तु इब्ने सफी इससे संतुष्ट नहीं थे. 
फिर 1952 में वह दिन आया जिसने न केवल इब्ने सफी और नकहत प्रकाशन बल्कि संपूर्ण उर्दू उपन्यास जगत को बदल दिया. इब्ने सफी की सलाह पर अब्बास हुसैनी जी ने मासिक जासूसी उपन्यास के प्रकाशन की व्यवस्था की और मार्च 1952 में 'जासूसी दुनिया' का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ. असरार ने पहली बार इब्ने सफी नाम का प्रयोग किया और उनके  प्रथम उपन्यास 'दिलेर मुजरिम' ने जासूसी दुनिया (उर्दू) के प्रथम उपन्यास होने का गौरव प्राप्त किया.  परन्तु इसी वर्ष अगस्त 1952 में वे पाकिस्तान चले गए. पाकिस्तान जाने के बाद भी भारत में उनके उपन्यास के चाहने वालों से उनका साथ नहीं छूटा और उनके उपन्यास नकहत प्रकाशन के द्वारा निरंतर भारत में प्रकाशित किये जाते रहे. 

 1955 में उन्होंने इमरान नाम से नए चरित्र को जन्म दिया और प्रसिद्ध इमरान सीरिज की शुरुआत हुयी. इस सीरिज की पहली पुस्तक थी - खौफनाक इमारत जो अगस्त 1955 में कराची और नवम्बर 1955 में भारत में प्रकाशित हुयी. 

अक्टूबर 1957  में उन्होंने  कराची में असरार प्रकाशन नाम से स्वयं की संस्था की शुरुआत की और पाकिस्तान में जासूसी दुनिया के प्रथम अंक 'ठंडी आग' का प्रकाशन हुआ. भारत में इसी माह इसका प्रकाशन हुसैनी जी के नकहत प्रकाशन द्वारा किया गया. 

उर्दू साथित्य में 'जासूसी दुनिया' और 'इमरान सीरिज' जैसे नगीने देने वाले सफी जी की मृत्यु उनकी जमम दिवस के ही दिन जुलाई 26, 1980 को लम्बी बीमारी के पश्चात हो गयी.

इब्ने सफी द्वारा लिखित इमरान सीरिज के उपन्यास 'बेबाकों की तलाश' पर आधारित 'धमाका'  नामक फिल्म दिसम्बर 1974 में प्रदर्शित हुयी थी. यह उनके द्ववारा लिखी गयी एकमात्र फिल्म थी. इसमें इब्ने सफी ने अपनी आवाज़ दी थी. 

विश्व विख्यात महान जासूसी लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने कहा था - "मुझे उर्दू का ज्ञान नहीं है परन्तु मुझे उपमहाद्वीप के जासूसी उपन्यासों की जानकारी है - और इब्ने सफी ही एकमात्र ओरिजनल लेखक हैं."

जासूसी दुनिया - नकहत प्रकाशन 

जासूसी दुनिया की वास्तविक शुरुआत भारत में ही मार्च 1952 में नकहत प्रकाशन, इलाहाबाद से श्री अब्बास हुसैनी द्वारा की गयी थी. जैसा की उपरोक्त वर्णित हैं की जासूसी दुनिया का प्रकाशन पाकिस्तान और भारत दोनों में ही अलग-अलग प्रकाशकों के द्वारा साथ-साथ किया जाता रहा था. 

नकहत प्रकाशन के द्वारा जासूसी दुनिया का प्रकाशन उर्दू से प्रारंभ किया गया था और मार्च 1952 में प्रकाशित प्रथम उपन्यास थी - दिलेर मुजरिम. 

बदती लोकप्रियता को देखते हुए जासूसी दुनिया को जल्द ही हिंदी भाषा में भी प्रकाशित किया जाने लगा. दिसम्बर 1952 में प्रथम अंक - खून की बौछार का प्रकाशन हुआ. 

जासूसी दुनिया के करीब 250+ विविध अंक प्रकाशित हुए जिनमे इब्ने सफी की मूल जासूसी दुनिया के साथ इमरान सीरिस का भी प्रकाशन किया गया था. 1990 में हुसैनी जी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र इम्तियाज हैदर ने संपादक की भूमिका निभायी.
 जासूसी दुनिया (हिंदी) आवरण - 
साभार - मोहम्मद हनीफ

11 comments:

Comic World said...

अनुपम भाई मुझे ख़ुशी है की आपने इस पोस्ट में एक ऐसी शख्सियत का ज़िक्र करना पसंद किया जिसे सही मायनों में वाहिद जासूसी लेखक करार दिया जा सकता है.आज अगर आम पाठक जिन्होंने इब्ने सफ़ी को कभी पढ़ा नहीं है वे अगर जासूसी नॉवल के बारे में सुनते है तो उनके ज़हन में सिर्फ सेक्स और बेसिरपैर की मारधाड़ से भरे दृश्य ही याद आते हैं और यह एक तरह से सही भी है क्योंकि अनगिनत लेखकों ने जासूसी नॉवल के नाम पर दर्शकों को यही सब तो परोसा है चाहे वो ओम प्रकाश शर्मा हो या फिर वेद प्रकाश कम्बोज.
असरार अहमद,जिन्होंने अपना तख़ल्लुस अपने पिता के नाम पर इब्ने-सफ़ी रखा(इनके पिता का नाम सफीउल्लाह था) पहले ऐसे कलमनिगार (लेखक) थे जिन्होंने अपनी जादू भरी लेखनी से जासूसी साहित्य में रूचि रखने वाले पाठकों को मदहोश किया और दिखाया की बिना सेक्स और अतिरंजित हिंसा के मसालों के एक सफल और दिलचस्प जासूसी साहित्य की रचना कैसे की जाती है.अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय से स्नातक सफ़ी ने भारत में निकहत प्रकाशन के लिए 125 उपन्यास जासूसी दुनिया श्रृंखला के लिए लिखे और इतने ही उपन्यास इन्होने बंटवारे के समय पाकिस्तान जाकर बसने के बाद अपने खुद के प्रकाशन असरार प्रकाशन के लिए 'इमरान श्रृंखला' के अंतर्गत लिखे जिन्होंने जासूसी दुनिया सरीखी ही प्रसिद्धि प्राप्त की.
इब्ने सफ़ी की खासियत इनकी अलौकिक कलम में थी जो पाठकों को ऐसा प्रतीत कराती थी जैसे की वे स्वयं ही वो सब महसूस कर रहे है जो लिखा जा रहा है और पाठकों को ऐसा महसूस होता था की वे किसी डिज्नीलैंड या फंतासीलैंड की यात्रा कर रहे हैं.इनके उपन्यास हलकी कॉमेडी और सशक्त थ्रिल,सस्पेंस व रोमांच से भरपूर होते थे जिसे इनकी सधी हुई लेखनी बड़े ही तरतीब और सुन्दर तरीके से शब्दों में पिरो कर पेश करती थी.इनके उपन्यासों का अगर किसी को सही मायनों में और मुक़म्मल तरीके से लुत्फ़ उठाना है तो वो उर्दू भाषा में लिखे गए इनके नॉवल पढ़े,हालाँकि इनके उपन्यास हिंदी और बंगला भाषा में भी अनुवादित किये गए हैं लेकिन जो मज़ा ख़ालिस उर्दू में मूल तौर पर लिखे गए उपन्यासों में है वो और किसी अन्य भाषा में नहीं.
उस दौर में इनकी लोकप्रियता का यह आलम था की इनके उपन्यास भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में ब्लैक मार्केट में बिका करते थे और आज भी इतना समय गुजरने के पश्चात् भी इनके उपन्यास बड़ी मुश्किल से ही पुरानी किताबों की दुकानों में मिलते हैं.
इनके पुराने उपन्यासों का पुनर्प्रकाशन Harper & Collins द्वारा अभी हाल में ही किया गया है और यहाँ मैं बड़ी ही सादगी और बिना किसी बड़बोलेपन की अनुभूति के यह बात बताना चाहूँगा की नाचीज़ ने भी Harper & Collins प्रकशन को सफ़ी साहब के कुछ उर्दू और हिंदी नोवल्स मुहय्या कराये थे जिन्हें उनके द्वारा प्रकाशित किया गया है.
खुशकिस्मती से मेरे संग्रह में सफ़ी साहब के कुछ हिंदी-उर्दू नॉवल शामिल है जिन्हें में गाहे-बगाहे पढ़ता रहता हूँ.अंत में अनुपम भाई ऐसी शानदार पोस्ट के लिए मेरी प्रसन्नता मिश्रित बधाई स्वीकार करें.

Acharya Girish Jha said...

Great revival of Ibne Safi and the character Imran. If I am not wrong the same character was replicated as Moorkh Rajesh in hindi version of Jasoosi Duniya.
It was great fun to read these novels and today I look back with nostalgic memories.
Thanks for reviving.

Anupam said...

जहीर भाई - आपके कमेंट्स के लिए ही तो काफी मेहनत और पसीने बहाकर ऐसे पोस्ट तैयार करता हूँ, अब इसी पोस्ट के लिए मुझे पूरा यकीन था की जहीर भाई दिल खोल कर लिखेंगे.
वैसे जहां तक जासूसी उपन्यासों की बात हैं, आपसे सहमत तो होना ही है क्योंकि मेरे घर में सैकड़ों की संख्या में नोवेल्स पड़े हैं और उनमे से कुछ पर जब मैंने सरसरी नजर मारी तो सेक्स और वाहियात खून खराबा का ही डोज़ ज्यादा दिखा. पर शुक्र है की पाठक जी और वर्मा जी (अपने शुरूआती उपन्यासों) में इस बुरी लत से दूर दिखे, वरना आजकल प्रचलित 'पंडित' (छद्म नाम) की पूरी जमात (केशव पंडित, गौरी पंडित, शिव पंडित, केवल पंडित, आशीर्वाद पंडित...) के उपन्यास किसी सस्ती बाजारू सी कहानी लगते हैं.

इब्ने सफी के बारे में तो एक पूरा ब्लॉग बन सकता है, उनका व्यक्तित्व और कृतियाँ बेमिसाल थी. Harper & Collins की पहल सार्थक है क्योंकि नयी पीढ़ी को इब्ने सफी (खासकर हिंदी जानने वालों को) उपलब्ध नहीं हैं. और आपको भी इस नेक कार्य में सहयोग हेतु धन्यवाद.

जाते-जाते, आपने अवश्य गौर किया होगा की इब्ने सफी साहब के किरदारों से हमारा परिचय मनोज चित्र कथाओं में भी हुआ है, विजय -हामिद के रूप में (उर्दू में वास्तविक नाम - फरीदी और हामिद ), जो की जासूसी दुनिया के हिंदी संस्करण में मुख्य किरदार रहे हैं.

कभी और मौका मिला तो इनका उपन्यास, अपलोड करने की कोशिश अवश्य करूँगा.

Anupam said...

आचार्य गिरीश झा जी - इस ब्लॉग में आपका स्वागत है. आपके कमेन्ट के लिए तह-ए-दिल से धन्यवाद. आपका सोचना बिलकुल सही है, जासूसी दुनिया के हिंदी संस्करण में ना जाने क्यों इब्ने सफी जी के चरित्रों के नामों में आंशिक परिवर्तन किया गया था. शायद हिंदी पाठकों के लिए हिन्दू नाम रखना उन्हें उपयुक्त लगा हो. पर खैर मेरे विचार में यह मुर्खता थी. जब लोग इब्ने सफी को पढ़ रहे हैं तो उनके चरित्र भी अपने वास्तविक पृष्ठभूमि में होने चाहिए.

इमरान सीरिज का प्रमुख किरदार इमरान जहां राजेश के रूप में प्रस्तुत हुआ था वहीँ जासूसी दुनिया (उर्दू) के प्रमुख किरदारों अहमद कमाल फरीदी (शुरू में इन्स्पेक्टर फरीदी, बाद में कर्नल फरीदी) और हमीद की जोड़ी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का रंग देखर विनोद-हामिद के रूप में प्रस्तुत किया गया था.

Comic World said...

पुरहौंसलाकुन अल्फाज़ों के लिए शुक्रिया अनुपम भाई,जी हाँ आपका मनोज चित्र कथा के चरित्रों के बाबत कहना दुरुस्त है क्योंकि बिमल चटर्जी साहब खुद सफ़ी साहब से बेहद मुतास्सिर(प्रभावित) थे और यदि आप उनके उपन्यास गौर से पढ़ेंगे तो आप सफ़ी साहब की झलक चटर्जी जी के आरंभिक उपन्यासों में पाएंगे.दरअसल अगर गौर किया जाये तो उस दौर के लगभग सभी लेखकों की जमात(चटर्जी,कम्बोज,ओम प्रकाश शर्मा आदि) किसी न किसी तरह इब्ने सफ़ी से प्रभावित थी जिसका असर सबके उपन्यासों में झलकता है,यह बात दीगर है की बाद में जाकर सभी ने अपनी-अपनी अलग पहचान बना ली.

Anonymous said...

kindly upload as soon as possible

akfunworld said...

अनुपम भाई इब्ने सफी के बारे में पोस्ट लिखने के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद, जान के ख़ुशी हुई की एशिया के सबसे बेहतरीन जासूसी उपन्यास लेखक मेरे इलाहाबाद से ही थे. वैसे मैं इनके बारे में जादा जानता तो नहीं हूँ बस एक दो बार इनका नाम अपने नाना जी से सुना था जो की मुझे अपने समय के बारे में कभी कभी बताते रहते हैं. पर सच में आज सफी जी के बारे में और जानकार मन प्रफुल्लित हो गया .... आगे भी इसी तरह के और पोस्ट्स का इंतज़ार रहेगा.... बस अब इनकी एक कोई नोवेल भी अपलोड कर दीजिये तो सोने पे सुहागा हो जाए.

वैसे आपको एक बार फिर से पूरे फ्लो में देखकर अच्छा लगा.

Anupam said...

akfunworld -
भाई, कैसे हो?

आपके कमेंट्स तो सदैव ही स्वागत योग्य होते हैं. इब्ने सफी के बारे में कई महीनों से लिखने का मन था पर इतना लम्बा पोस्ट लिखने और खासतौर से उनके बारे में जानकारी लिखना बहुत मुश्किल लग रहा था, क्योंकि वे अपने आप में एक ग्रन्थ हैं. जानकार ख़ुशी हुयी की आपने नानाजी भी उनके प्रशंसकों में से एक थे. और कुछ दुःख भी क्योंकि आपके पोस्ट से यह लगता है की वे किताबें आपके पास नहीं हैं. हमारे बड़ों ने जितनी शानदार किताबें अपने समय में पढ़ी हैं, उनका एक अंश भी आज हमको नसीब नहीं है, काश वे पुस्तकें वो भी वैसे ही सहेज पाते जैसे आज हम सब कोशिश कर रहे हैं.

रही बात इब्ने सफी जी के नावेल की तो मेरा प्रयास हैं की इस रविवार (१३ मार्च) की सुबह अपने जन्मदिन पर आप सब को मेरी और से ये मिठाई अवश्य प्रेषित करूँ.

और फ्लो तो कुछ महीनों से आ ही गया है. है न? पिछले महीने तो एक प्यारे से बेटे के पिता बनने की ख़ुशी और जिम्मेदारियों की वजह से ब्लॉग से दूर रहा, और इस बेहद खूबसूरत पलों का भरपूर जश्न मनाया. अब जिम्मेदारियां भी बढ़ गयी है पर कोशिश करता रहूँगा की यहाँ भी सक्रीय रहूँ. आशा हैं ब्लॉग पर कॉमिक्स के अलावा अन्य सामग्रियों के समावेश का निर्णय आपको पसंद आया होगा.

kuldeepjain said...

हाय अनुपम

एक बेहद उम्दा और काबिले तारीफ पोस्ट. श्री इब्ने सफी को समर्पित ये पोस्ट पुस्तक प्रेमिओ के लिए यादगार बन गयी है. मुझे अफ़सोस है की पढने का मेरा शौक इतना विस्तृत होते हुए भी मै सफी जी की कोई रचना नहीं पढ़ सका. अपना पुस्तकालय में 'जासूसी दुनिया' बहुतायत में दिक्थी थी पर कभी ध्यान ही नहीं गया . और येही एक वजह है की जासूसी दुनिया के प्रथम अंक का बेहद बेसब्री से इंतज़ार है. इस अजिमोशान जासूसी लेखक से परिचय करने के लिए बेहद आभार और इस पोस्ट के लिए बेहद शुक्रिया.

अविनाश सुर्यवन्शी said...

सही कहा भाई इब्ने सफी जैसा नावेल निगार कोई दूसरा नहीं पैदा हुआ और शायद होगा भी नहीं उनके नावेल में यह विशेषता है की आप बार बार पढ़िए लेकिन आप बोर नहीं होंगे मेरे पास भी उनके कुछ नावेल संभाल के रखे हुए हैं जन्हें गाहे बगाहे में पढता रहता हूँ !

Anonymous said...

sir mene aapke blog pe pahli baar ibne saafi ji ke bare mein padha and unke kuch novels bhi padhe hain. sach janiye mein in 2 novels ko padh ke hi unka fna ho gaya hu.

aapse gujarish hai ki agar aapke paas unke kuch aur novels hindi mein ho to kripya upload kijiye and agar koi aur blog pe ye uplabdh hain to kripya kar ke bata dijiye. mene google pe kafi search mara hai but unke sare novels urdu mein aa rahe hain.