Tuesday, November 30, 2010

Diwakar Chitrakatha First Issue - Kshamadaan

कॉमिक्स के चाहने वाले मित्रों, 

इस महीने की आठवी चित्रकथा आपके सम्मुख प्रस्तुत करते हुये अत्यंत प्रसन्नता हो रही है. इसके पहले किसी भी महीने में मैंने इतनी कॉमिक्स स्केन और पोस्ट नहीं की है और शायद आगे भी ना कर सकूं. 

इसलिए इस पोस्ट को ख़ास बनाने के लिए प्रस्तुत है - बहुत से कॉमिक्स प्रेमियों के लिए अनजाना सा एक नाम - दिवाकर चित्रकथा का प्रथम अंक - क्षमादान 

आशा करता हूँ आप सभी को पसंद आएगी. 

नोट - स्केन मुझे अपने एक जैन मित्र से प्राप्त हुयी है. बाकी  एडिट और अपलोडिंग का कार्य इस नाचीज ने किया है :-).

6 comments:

akfunworld said...

Again i'm the first one to comment... Aap soch rahe honge ki lagta hai ye naalayak din bhar net pe hi baitha rahta hai, to aisa nahi hai par din bhar me ek bar aapka, zaheer bhai ka aur rko ka blog jaroor check karta hun, isiliye ek bar fir se sabse pahle comment kar raha hun.
Han to ab baat is comics ki... Sabse pahle ek aur anjaane publication ki comics provide karne ke liye dhanyavaad. Aasha karta hun ki dheere dheere mere paas sabhi 80 publications jinke naam apne iceproject blog mein diye hain ki kam se kam ek comics to mere paas ho hi jayengi.
Comics to sahi thi par ek cheej samajh mein nahi aaya ki sirf 36 page hone ke baad bhi iska price 20 rupayee kyon tha, kadachit is publication ke band hone ke peeche iske moolya ka bhi bahut bada hath raha hoga.
By the way thank you again for this comics.

Anupam said...

@akfunworld -
अरे नहीं भाई, ऐसा सोचने लगा तो पहला नालायक तो मैं खुद कहलाऊंगा, जो अपने प्रशंसकों के बारे में ऐसा विचार रखे. और आप तो सबसे पहले हौसला-अफजाई के लिए आते हैं. तो आपका तो विशेष स्वागत रहेगा.

इस प्रकाशन के बारे में हमारी जानकारी काफी कम है, क्योंकि ये जैन समाज के द्वारा और उनके लिए प्रकाशित किया जाता था. इसलिए शायद जैन समाज से सम्बन्ध रखने वालों तक ही इनकी पहुच सीमित रह गयी.

रही बात मूल्य की तो ये तो बहुत अधिक वाकई में था. वैसे यह RE-PRINT EDITION है, परन्तु पुराने जो कॉमिक्स मैंने देखे हैं उनके मूल्य भी सोलह रूपये अंकित थे, जो की किसी भी सूरत में एक सामान्य कीमत नहीं थी. पर जैसा की यह केवल जैन समाज को ध्यान में रखकर प्रकाशित थे, शायद इसलिए एक सीमित वर्ग में ही पहुच के चलते इनकी कीमत को ज्यादा रखा गया हो. बाकी तो प्रकाशक ही बेहतर जानते होंगे.

The Devil said...

Thanks for such a rare post. haven't even heard of this one

Aby said...

Thanx a lot Anupam bro for this rare gem. The scanning quality is very good. Appreciate ur efforts. Please keep on bringing such rare issues

Anupam said...

The Devil - Welcome Brother. The rarity of this publication lies only in the fact that it was published with a particular group of people. Else the stories and works are great to make it a success among readers outside Jainism

Anupam said...

Aby - I am trying my best brother to post only the rare and uncommon issues as best as possible.

One great idea also hit my mind. Now when I will post an article on any publication on ICE PROJECT BLOG. I will also post its comics here. So that the reader can get both the informations and the related comics. I believe it would make the project more interesting and powerful.